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मेरा कमरा (MERA KAMRA)

Rs 195.00 Rs 165.00

  • Pages: 204
  • Year: 2017, 1st Ed.
  • ISBN: 978-81-932584-8-4
  • Binding: paper Back
  • (Hardbound: Price: Rs.550, selling Price: Rs.275)
  • Language: Hindi
  • Publisher: The Marginalised Publication

Description

‘मेरा कमरा’ – हर रचनाकार एक ऐसी जगह की तालाश में होता है जहां वह सुरक्षित और सुचिंतित हो अपनी रचना को शब्दाकार कर सके. स्त्रियों के लिए यह जगह कई तरह की सत्ताओं से द्वंद्व और संघर्ष के विपरीत प्राप्य नहीं हो पाता तो वो मन के कोने को ही स्पेस बना लेती हैं. इसी तरह हर लेखक-लेखिका का अपना-अपना कमरा है-द्वंद्व, संघर्ष,कशमकश का जिससे गुजरकर उनके विचार सामने आ पाए . इसी कड़ी में नामवर सिंह के लिए यह कमरा “शरण्य”, राजेन्द्र यादव के लिए “साम्राज्य” है, सुधा अरोड़ा को’अलौकिक” कोने की तलाश है तो मृदुला गर्ग का “मन” ही उनके लिए वो आकाश है जिनकी तलाश हमेशा बनी रही है. इनके अलावा इस किताब में महीप सिंह, राजी सेठ चित्र मुद्गल, अर्चना वर्मा, विद्या शर्मा, कैलाश वाजपेयी आदि अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों ने अपने कमरे को उजागर किया है.

वर्जीनिया वुल्फ कहती हैं कि स्त्री को लिखने के लिए दो चीजे़ं चाहिए-निश्चित तौर पर उसका अपना कमरा और पर्याप्त धन। फिर हम ‘फ़िलिस वीटले’ की क्या कहें, जो एक गुलाम थी और अपनी भी मालिक नहीं थी। उस कृशकाय, कमज़ोर, अश्वेत लड़की का स्वास्थ्य इतना नाजुक था कि जब-तब उसे अपने लिए ही सेवक की ज़रूरत रहती थी। वह एक ऐसी स्त्री थी, अगर वह श्वेत होती तो उसे आसानी से अपने समय के समाज की सभी स्त्रियों और अधिकांश पुरुषों में श्रेष्ठतम् बुद्धिजीवी मान लिया जाता एलिस वाकर.

मैं तुम्हें केवल एक छोटे से मुद्दे पर सलाह दे सकती हूँ, और वह यह कि यदि कोई स्त्री कथा-साहित्य लिखना चाहती है तो उसके पास संसाधन होने चाहिए और अपना एक कमरा भी; और जैसा कि आप देख सकते हैं। इसके बिना स्त्री की असली प्रकृति और कथा-साहित्य की असली प्रकृति की बड़ी समस्या अनसुलझी ही रहती है वर्जीनिया वुल्फ़

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