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विभीषण का दुःख (VIBHISHAN KA DUKH)

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  • Pages: 120 
  • Year: 2018
  • ISBN: 978-93-87441-09-5
  • Binding: paper back
  • Language: Hindi 
  • Publisher: The Marginalised Publication

Description

विभीषण का दुःख 

मुसाफिर बैठा कविता से बड़ा और व्यापक काम लेते हैं। वे उत्पीड़ित जमात के संघर्षों का चित्रण ही नहीं करते, उसके नये चिंतन को भी शब्द देते हैं। लोकतंत्र की एक अलग गहरी और जरूरी समझ उनके पास है। वे भारतीय मिथक, वर्चस्ववादी संस्कृति और परम्परा की नयी व्याख्या करते हैं, जिसे सुविधा के लिए हम दलित पाठ कह सकते हैं, लेकिन असल में वही हमारे समय का सही और न्यायपूर्ण पाठ है। एक छोटी-सी कविता है, ‘शुद्दता का नया पाठ’। विकलांगों को दिव्यांग कहने के पीछे की कुत्सित सोच को यह कविता महज दस-बारह शब्दों में उजागर कर देती है।

शीर्षक कविता, ‘विभीषण का दुख’ एक ऐसी रचना है, जो उनकी अभिव्यंजना शक्ति के साथ-साथ बोद्धिक क्षमता को भी दर्शाती है। उनके सवाल न केवल गंभीर और मौलिक हैं, बल्कि वे परम्परा और समकाल पर एक साथ चोट करने में सक्षम हैं।

यह संग्रह दलित कविता को एक नया आयाम ही नहीं देता है, बल्कि इसे ही कविता की मुख्यधारा मानने की दावेदारी को मजबूत करता है।

मदन कश्यप

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